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बुजुर्गों का करें सम्मान (लघु नाटिका) Hindi Play on old home

 बुजुर्गों का करें सम्मान “पत्थरों के शहर में कच्चे मकान कौन रखता है। आजकल हवा के लिए रोशनदान कौन रखता है।  हर चीज़ मुहैया है मेरे शहर में किस्तों पर,  आजकल हसरतों पर लगाम कौन रखता है। बहलाकर छोड़ आते हैं वृद्धाश्रम में मां-बाप को, क्योंकि आजकल घर में पुराना सामान कौन रखता है?” एक आश्रम का इंचार्ज आता है। साथ में बूढ़ी महिला है।  वह कहता है-आइए माताजी आइए। एक वृद्ध चश्मा लगा कर अखबार पढ़ रहा है। खड़े होते हुए- अरे बहन जी नमस्ते। आइए आइए। इंचार्ज (आगे बढ़ते हुए)- क्या जमाना आ गया है, एक माता चार बच्चों को पाल सकती है, पर चार बच्चे मिलकर एक माँ को नहीं पाल सकते। इसीलिए तो ये वृद्धाश्रम की चौखट पर खड़े हैं। स्लोगन -  ए जमाने यह कैसी तेरी रुसवाई है  वृद्धाश्रम में फिर आज एक मां आई है  क्या भूल गया तू वह तेरी परछाई है क्या भूल गया तेरी यह जिंदगी उसने ही बनाई है  जो ना भूला, तो फिर आज किसकी मां वृद्धाश्रम आई है? कहकर चला जाता है।  वृद्धा इधर-उधर देख रही है। वृद्ध - बहन जी, इत्मीनान से बैठिए। अब तो इसे अपना ही घर समझिए। वृद्धा (बिगड़ते हुए)- न, न, म...

हिंदी: कल, आज और कल (Hindi poem on Hindi diwas)

  हिंदी: कल, आज और कल नित नूतन आयामों को गढ़ती, हिंदी भाषा महान है, इसके-उसके, मेरे-तेरे, सबके प्राणों की झंकार है। संस्कृत की यह सच्ची बेटी, प्रगति पथ पर बढ़ती है, हर दिल में बसने वाली यह, नव ऊर्जा सी भरती है। सबके दिलों के तार झंकृत कर, बढ़ा रही परिवार है, विश्व पटल पर अब तुम देखो, इसका छाया विस्तार है। टी.वी., नाटक, रंगमंच पर, इसकी मच रही धूम है,  मुक्त कंठ से इसकी स्तुति, कर रहा सारा जहान है। दुनिया के हर एक कोने में, बढ़ रहा इसका मान है, नित नूतन आयामों को गढ़ती, हिंदी भाषा महान है। राजनीति हो या तकनीक, आज सबने इसे अपनाया है, नए युग की हर धड़कन ने भी, इस पर प्यार लुटाया है। यह केवल शब्दों की रचना, या वर्णों का एक मेल नहीं, जन-जन की यह प्यारी भाषा, हर मन का उल्लास है। आज बदलते दौर में इसका, रंग-रूप सब कुछ बदला है, शब्द नए, संसार नया है, पर भावों का रूप वही है। मोबाइल की स्क्रीन पर भी, हिंदी ने अपना घर बनाया है, ई-मेल, ब्लॉग, सोशल मीडिया को, बहुतायत से अपनाया है। सागर जैसे सबको अपनाकर, किया वृहद रूप निर्माण है, नित नूतन आयामों को गढ़ती, हिंदी भाषा महान है। कभी कबीर की साखी ...

मत काटो इन पेड़ों को (हिंदी कविता)

  “मत काटो इन पेड़ों को” मत काटो इन पेड़ों को, ये साँसों का अनुपम संसार हैं। इनकी ठंडी छाँव तले, बसते जीवन के सब त्योहार हैं। नदियाँ सिर्फ पानी नहीं, धरती मां के नयनों का नीर हैं। इनकी हर लहर में छिपी, हम सब मानव की तक़दीर है। सोचो, पक्षी जब घर खो देंगे, तो वे गीत कहाँ फिर गाएँगे? सूनी-सूनी उजड़ी डालों पर, फिर कैसे वे चहचहाएंगे? पहाड़ अगर मौन हुए तो, फिर बादल किससे टकराएँगे? सूख गई प्यारी धरती माँ, तो कैसे हम जी पाएँगे? कब जानेंगे प्रकृति की कीमत? जब आख़िरी पेड़ कट जाएगा, जब हर नदी सूख जाएगी, अंतिम चिड़िया भी उड़ जाएगी… अरे, तब तक तो बहुत देर हो जायेगी, हर सांस तब थम जाएगी। वैज्ञानिक खोज धरी रह जाएगी, तकनीक पड़ी रह जाएगी। इसलिए  आज भी वक़्त है साथियो, आओ मिलकर ये प्रण करें। लगाएं हम हर घर में पौधा, हर आँगन में हरियाली भरें। अगली पीढ़ी को धन नहीं, सांसों का अनुपम उपहार दें‌‌। वो हम पर गर्व करें, इतराएँ, उनको हरा-भरा संसार दें।    आओ मिल प्रकृति को बचाएँ, यही मानवता की पहचान है। धरती हँसे, गाए, मुस्काए, इसमें ही हम सबकी शान है। धरती हँसे, गाए, मुस्काए, इसमें ही हम सबकी...