हिंदी: कल, आज और कल नित नूतन आयामों को गढ़ती, हिंदी भाषा महान है, इसके-उसके, मेरे-तेरे, सबके प्राणों की झंकार है। संस्कृत की यह सच्ची बेटी, प्रगति पथ पर बढ़ती है, हर दिल में बसने वाली यह, नव ऊर्जा सी भरती है। सबके दिलों के तार झंकृत कर, बढ़ा रही परिवार है, विश्व पटल पर अब तुम देखो, इसका छाया विस्तार है। टी.वी., नाटक, रंगमंच पर, इसकी मच रही धूम है, मुक्त कंठ से इसकी स्तुति, कर रहा सारा जहान है। दुनिया के हर एक कोने में, बढ़ रहा इसका मान है, नित नूतन आयामों को गढ़ती, हिंदी भाषा महान है। राजनीति हो या तकनीक, आज सबने इसे अपनाया है, नए युग की हर धड़कन ने भी, इस पर प्यार लुटाया है। यह केवल शब्दों की रचना, या वर्णों का एक मेल नहीं, जन-जन की यह प्यारी भाषा, हर मन का उल्लास है। आज बदलते दौर में इसका, रंग-रूप सब कुछ बदला है, शब्द नए, संसार नया है, पर भावों का रूप वही है। मोबाइल की स्क्रीन पर भी, हिंदी ने अपना घर बनाया है, ई-मेल, ब्लॉग, सोशल मीडिया को, बहुतायत से अपनाया है। सागर जैसे सबको अपनाकर, किया वृहद रूप निर्माण है, नित नूतन आयामों को गढ़ती, हिंदी भाषा महान है। कभी कबीर की साखी ...
“मत काटो इन पेड़ों को” मत काटो इन पेड़ों को, ये साँसों का अनुपम संसार हैं। इनकी ठंडी छाँव तले, बसते जीवन के सब त्योहार हैं। नदियाँ सिर्फ पानी नहीं, धरती मां के नयनों का नीर हैं। इनकी हर लहर में छिपी, हम सब मानव की तक़दीर है। सोचो, पक्षी जब घर खो देंगे, तो वे गीत कहाँ फिर गाएँगे? सूनी-सूनी उजड़ी डालों पर, फिर कैसे वे चहचहाएंगे? पहाड़ अगर मौन हुए तो, फिर बादल किससे टकराएँगे? सूख गई प्यारी धरती माँ, तो कैसे हम जी पाएँगे? कब जानेंगे प्रकृति की कीमत? जब आख़िरी पेड़ कट जाएगा, जब हर नदी सूख जाएगी, अंतिम चिड़िया भी उड़ जाएगी… अरे, तब तक तो बहुत देर हो जायेगी, हर सांस तब थम जाएगी। वैज्ञानिक खोज धरी रह जाएगी, तकनीक पड़ी रह जाएगी। इसलिए आज भी वक़्त है साथियो, आओ मिलकर ये प्रण करें। लगाएं हम हर घर में पौधा, हर आँगन में हरियाली भरें। अगली पीढ़ी को धन नहीं, सांसों का अनुपम उपहार दें। वो हम पर गर्व करें, इतराएँ, उनको हरा-भरा संसार दें। आओ मिल प्रकृति को बचाएँ, यही मानवता की पहचान है। धरती हँसे, गाए, मुस्काए, इसमें ही हम सबकी शान है। धरती हँसे, गाए, मुस्काए, इसमें ही हम सबकी...