“मत काटो इन पेड़ों को”
मत काटो इन पेड़ों को, ये साँसों का अनुपम संसार हैं।
इनकी ठंडी छाँव तले, बसते जीवन के सब त्योहार हैं।
नदियाँ सिर्फ पानी नहीं, धरती मां के नयनों का नीर हैं।
इनकी हर लहर में छिपी, हम सब मानव की तक़दीर है।
सोचो,
पक्षी जब घर खो देंगे, तो वे गीत कहाँ फिर गाएँगे?
सूनी-सूनी उजड़ी डालों पर, फिर कैसे वे चहचहाएंगे?
पहाड़ अगर मौन हुए तो, फिर बादल किससे टकराएँगे?
सूख गई प्यारी धरती माँ, तो कैसे हम जी पाएँगे?
कब जानेंगे प्रकृति की कीमत? जब आख़िरी पेड़ कट जाएगा,
जब हर नदी सूख जाएगी, अंतिम चिड़िया भी उड़ जाएगी…
अरे,
तब तक तो बहुत देर हो जायेगी, हर सांस तब थम जाएगी।
वैज्ञानिक खोज धरी रह जाएगी, तकनीक पड़ी रह जाएगी।
इसलिए
आज भी वक़्त है साथियो, आओ मिलकर ये प्रण करें।
लगाएं हम हर घर में पौधा, हर आँगन में हरियाली भरें।
अगली पीढ़ी को धन नहीं, सांसों का अनुपम उपहार दें।
वो हम पर गर्व करें, इतराएँ, उनको हरा-भरा संसार दें।
आओ मिल प्रकृति को बचाएँ, यही मानवता की पहचान है।
धरती हँसे, गाए, मुस्काए, इसमें ही हम सबकी शान है।
धरती हँसे, गाए, मुस्काए, इसमें ही हम सबकी शान है।

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