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हिंदी: कल, आज और कल (Hindi poem on Hindi diwas)

 हिंदी: कल, आज और कल













नित नूतन आयामों को गढ़ती, हिंदी भाषा महान है,
इसके-उसके, मेरे-तेरे, सबके प्राणों की झंकार है।

संस्कृत की यह सच्ची बेटी, प्रगति पथ पर बढ़ती है,

हर दिल में बसने वाली यह, नव ऊर्जा सी भरती है।

सबके दिलों के तार झंकृत कर, बढ़ा रही परिवार है,

विश्व पटल पर अब तुम देखो, इसका छाया विस्तार है।

टी.वी., नाटक, रंगमंच पर, इसकी मच रही धूम है, 

मुक्त कंठ से इसकी स्तुति, कर रहा सारा जहान है।

दुनिया के हर एक कोने में, बढ़ रहा इसका मान है,

नित नूतन आयामों को गढ़ती, हिंदी भाषा महान है।



राजनीति हो या तकनीक, आज सबने इसे अपनाया है,

नए युग की हर धड़कन ने भी, इस पर प्यार लुटाया है।

यह केवल शब्दों की रचना, या वर्णों का एक मेल नहीं,

जन-जन की यह प्यारी भाषा, हर मन का उल्लास है।

आज बदलते दौर में इसका, रंग-रूप सब कुछ बदला है,

शब्द नए, संसार नया है, पर भावों का रूप वही है।

मोबाइल की स्क्रीन पर भी, हिंदी ने अपना घर बनाया है,

ई-मेल, ब्लॉग, सोशल मीडिया को, बहुतायत से अपनाया है।

सागर जैसे सबको अपनाकर, किया वृहद रूप निर्माण है,

नित नूतन आयामों को गढ़ती, हिंदी भाषा महान है।


कभी कबीर की साखी में गूँजी, कभी तुलसी की चौपाई में,

प्रेमचंद की कलम से निकली, बसी मीरा की सच्चाई में।

कभी माँ की लोरी बनकर, बचपन को सहलाती है,

कभी संतों की वाणी बनकर, मन को राह दिखाती है।

कभी विज्ञान की भाषा बनकर, ज्ञान का परचम लहराती है,

ज्ञान-विज्ञान की धाराओं में, नित नए फूल खिलाती है।

अमिट छाप यह छोड़ रही है, नए समय के भाल पर,

हिंदी की बिंदी चमकेगी, सूरज सम इस आसमान पर।

शत-शत नमन इस भाषा को, जो हर एक युग की जान है,

नित नूतन आयामों को गढ़ती, हिंदी भाषा महान है।

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